अगर आपको लगता है कि एक आँख ना होने की वजह से लुटेरे अपनी आंखों में ऑय पैच पहनते हैं तो ऐसा नहीं है दरअसल ऐसा वह अँधेरे और रौशनी के प्रभाव से बचने के लिए करते थे।
ओरेगन के पैसिफिक यूनिवर्सिटी के विज़न साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक जिम शीडी ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को बताया कि अंधेरे से प्रकाश की ओर जाते समय आँखें जल्दी से अनुकूलित नहीं होती हैं और अध्ययनों से पता चला है कि इसमें 25 मिनट तक का समय लग सकता है। इसके विपरीत उन्हें उज्ज्वल प्रकाश से अंधेरे में जाने के दौरान आंखों को अनुकूलित करने के लिए "फोटो पिगमेंट के रीजनरेशन की आवश्यकता होती है।"
समुद्री लुटेरों को अक्सर दिन के उजाले से अपने अंधेरे डेक के ऊपर और नीचे जाना पड़ता था, और शीडी कहते हैं कि इन स्मार्ट लोगों ने "एक आंख पर पैच पहना, ताकि उजाला होने पर भी एक आँख के लिए अंधेरा रहे।" जब समुद्री डाकू डेक से नीचे चला जाता था, तो वह पैच को दूसरी आंख पर स्विच कर लेता था और अंधेरे में आसानी से देख सकता है।
क्या हम सही हैं?
हालांकि इतिहास से कोई भी स्रोत नहीं है जो इस तथ्य को बताता है, ऐसा कोई सवाल या जवाब नहीं है जो एक आंख को अंधेरे में अनुकूलित करने से सम्बंधित हो। मिथबस्टर्स ने 2007 में अपने समुद्री डाकू विशेष में इस परिकल्पना का परीक्षण किया और यह प्रशंसनीय था (ऐतिहासिक स्रोतों की कमी के बिना इसकी पुष्टि की जा सकती है)। पायलटों के लिए भी एक सैन्य नियमावली में कहा गया है कि "भले ही प्रकाश एक आंख में चमक बनाये रख सकता है, लेकिन दूसरी जो ढकी हुई है इसके अंधेरे अनुकूलन को बनाए रखेगी। इसलिए यह एक उपयोगी जानकारी है। तो अंत में यह तथ्य सत्य है की डाकू रौशनी से आने और रौशनी में जाने के लिए पैच का उपयोग करते थे।
Article Source: Mentalfloss
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