विलुप्त होने की राह पर भारत के 10 पारंपरिक खाद्य पदार्थ

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जीव जगत के साथ-साथ खाद्य पदार्थों पर भी पर्यावरणीय और सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जिससे कई प्रकार के खाद्य पदार्थ और फसलें भी विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं। इन खाद्य-पदार्थों का महत्व सिर्फ खाने की मेज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये भारतीय संस्कृति और परंपरा के भी अभिन्न अंग हैं, जिनके संरक्षण की ओर कदम बढ़ाए जाने की ज़रूरत है। आज हम विस्तार से निम्नलिखित कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों की चर्चा करेंगे जो भारत में विलुप्त होने की राह पर हैं:


चक–हाओ या काला चावल और असम चाय या असमिका की तस्वीर

1. इंडियन बनाना वेरायटीज

भारत में केले की कई स्थानीय किस्में हैं जैसे कि मलभोग, नेन्द्रन, और श्रीमंती जो अपने विशेष स्वाद और पोषण मूल्य के लिए जानी जाती हैं। लेकिन वर्तमान में, व्यावसायिक कृषि में उच्च उत्पादन वाली प्रजातियों की मांग के कारण इन पारंपरिक किस्मों की खेती में कमी आई है।


केले की विभिन्न प्रजातियों की तस्वीर

2. कोदो और कुटकी (छोटे अनाज)

इन छोटे अनाजों को पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाता है और इन्हें उच्च पोषण मूल्य के लिए सराहा जाता है। लेकिन बाजार में चावल और गेहूं की बढ़ती मांग और सिमित उत्पादन के कारण इन अनाजों की खेती घटती जा रही है। कोदो की खेती लगभग 3000 साल से की जा रही है। उच्च पोषण के साथ ही यह अनाज ग्लूटेन-फ्री भी होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोदो-कुटकी की बहुत मांग है। शुगर फ्री चावल के नाम पर इसे फाइव स्टार होटलों में भी परोसा जाता है।


कोदो और कुटकी (छोटे अनाज) की तस्वीर

3. जंगली मधुमक्खी का शहद

भारत के कई आदिवासी समुदाय जंगली मधुमक्खियों से शहद इकट्ठा करते हैं जो इनकी आजीविका का साधन है। लेकिन पर्यावरणीय परिवर्तन और जंगलों की कटाई के कारण ये प्राकृतिक शहद स्रोत घटते जा रहे हैं। भारत के कुछ हिस्सों में, जैसे कि वेस्टर्न घाट्स और हिमालयी क्षेत्रों में, परंपरागत तरीकों से जंगली शहद का संग्रह किया जाता रहा है। यह शहद न केवल स्वास्थ्यवर्धक होता है बल्कि इसकी मांग भी उच्च रहती है। वनों की कटाई और प्राकृतिक आवास के ह्रास के कारण शहद के साथ यह मधुमक्खियां भी लुप्त होती जा रही है।


जंगली मधुमक्खी का छत्ता

4. पारंपरिक घी

पारंपरिक रूप से बनाया जाने वाला घी, जिसे देसी गायों के दूध से बनाया जाता है, अब दुर्लभ होता जा रहा है। व्यावसायिक डेयरी फार्मिंग और हाइब्रिड गायों के उपयोग के कारण पारंपरिक घी की प्रामाणिकता और उपलब्धता पर प्रभाव पड़ा है।


पारंपरिक देसी घी


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5. असम चाय

असम में उगाई जाने वाली पारंपरिक चाय की किस्में, जिन्हें असमिका कहा जाता है, भी व्यावसायिक चाय किस्मों की बढ़ती मांग के कारण विलुप्ति के कगार पर हैं। असम की चाय दिमाग को चुस्त रखने के साथ कई तरह के कैंसर से भी बचाने में काफी असरदार है।


असम चाय या असामिका



6. बांस का चावल (Bamboo Rice)

बांस के पेड़ के फूलने के बाद जो इसके जीवनकाल के लगभग आखरी वर्षों में होता है से प्राप्त होने वाला यह विशेष प्रकार का चावल बहुत ही दुर्लभ होता है। जो अब भारत में कम ही दिखाई देता है। यह चावल न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि इसमें उच्च पोषणीय तत्व भी होते हैं। इस चावल का ग्लाइकेमिक इंडेक्स कम होता है और इस वजह से ये मधुमेह के रोगियों के लिए लाभदायक है। 


बांस का चावल (Bamboo Rice)

7. चक-हाओ (Black Rice)

मणिपुर में उगाई जाने वाली चक-हाओ ब्लैक राइस को इसके अनूठे स्वाद और पोषणीय महत्व के लिए जाना जाता है। यह एंथोसायनिन में समृद्ध होता है जो कि इसके काले रंग का कारण भी है। लेकिन आधुनिक खेती और बढ़ती व्यावसायिक मांग के कारण इसकी पारंपरिक खेती घट रही है।


चक–हाओ या काला चावल

8. नावल (Navara Rice)

केरल में पारंपरिक रूप से उगाया जाने वाला नावल (Navara) चावल आयुर्वेदिक उपचारों में उपयोग होता है। इसके अनूठे औषधीय गुणों के कारण इसे बहुत महत्व दिया जाता है। हालांकि, बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण इसकी खेती कम हो रही है।


नवारा राइस, नावल या लाल चावल

9. कटहल के बीज (Jackfruit Seeds)

कटहल भारत में एक लोकप्रिय फल और सब्ज़ी है, लेकिन इसके बीज जो कि पोषण से भरपूर होते हैं, अक्सर उपेक्षित रह जाते हैं। इन बीजों का उपयोग विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों में होता है लेकिन आधुनिक खान-पान की प्रवृत्तियों के कारण इसका उपयोग कम हो रहा है।


कटहल के बीज (jackfruit seeds)

10. महुआ (Mahua)

भारतीय आदिवासी समुदायों द्वारा पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाने वाला महुआ, इसके फूलों से बनी मिठाइयाँ और शराब बहुत प्रसिद्ध हैं। हालांकि, वनों की कटाई और औद्योगिक विकास के कारण इस पेड़ की प्रजातियाँ भी कम होती जा रही हैं।


महुआ का पेड़

हमने देखा, भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अंतर्निहित ये खाद्य पदार्थ न केवल हमारी थालियों में विविधता लाते हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपराओं को भी समृद्ध करते हैं। इनका संरक्षण हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की भलाई के साथ-साथ हमारी आगामी पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पोषण को सुनिश्चित करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। हमें ऐसे प्रयासों का समर्थन करने की आवश्यकता है जो इन खाद्य संसाधनों को बचाने और उनका उत्थान करने में मदद करते हैं। आइए हम सभी मिलकर इस दिशा में प्रयास करें और अपनी आहार रुपी विरासत को बचाने का संकल्प लें।


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